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“उत्तर प्रदेश में था कभी जिसका राज, आज उसी का हो गया सूपड़ा साफ़”; क्या अपने गढ़ में करारी हार मिलने के बाद बसपा मिलाएगी बीजेपी के साथ हाथ??

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ख़बर पड़ताल ब्यूरो:- लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने हर किसी को हैरानी में डाल दिया है, सबसे ज्यादा चौकाने वाले नतीजे उत्तर प्रदेश के रहे जहां सपा ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया, लोकसभा की 80 सीटों में से 36 सीटों पर कब्जा कर लिया वहीं बीजेपी को मात्र 33 सीटें ही मिली, पर इन सब में सबसे ज्यादा हार का सामना उत्तर प्रदेश में एक समय पर जिसका राज चलता था उसी को करना पड़ा।

(रिपोर्ट: साक्षी सक्सेना)

हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का जिसे महिलाएं दीदी बोलती थीं और आज भी कई महिलाएं जो उन्हें पसंद करती हैं वह बोलती हैं, आज उसी मायावती की पार्टी बसपा का सूपड़ा साफ हो गया है, पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली है. मायावती की पार्टी को उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नहीं मिली है, अब चर्चाएं ये हो रही हैं की सपा कांग्रेस से हाथ मिला सकती है तो बसपा बीजेपी से क्यों नहीं??

अठारहवीं लोकसभा चुनाव के नतीजों को सीटवार देखने से लगता है कि संकट से जूझ रही बसपा को सबसे ज्यादा झटका कांग्रेस ने ही दिया है। कांग्रेस का जिन सीटों पर बेहतर प्रदर्शन रहा है, उनमें से 50 प्रतिशत से अधिक सीटों के पांच प्रतिशत मतदाताओ ने इस बार ‘हाथी’ का बटन नहीं दबाया। प्रदेश की 50 लोकसभा सीटों पर बसपा को दस प्रतिशत से भी कम वोट मिला है। इस बीच विधानसभा चुनाव में भी अब सपा-कांग्रेस के साथ रहने की घोषणा के बाद बसपा के भाजपा से हाथ मिलाने की भी चर्चा होने लगी है।

वर्ष 2014 में भी कोई सीट न आने पर भी बसपा 34 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। बसपा का वोट बैंक भी 19 प्रतिशत से अधिक बना रहा, लेकिन इस चुनाव में घटकर 9.39 प्रतिशत ही रह गया है। सीटवार नतीजे देखने से साफ है कि बसपा को 17 सीटों पर पांच प्रतिशत से भी कम वोट मिला है। इनमें आठ सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करने के साथ ही रायबरेली, बाराबंकी, अमेठी और इलाहाबाद सीटें जीत भी ली हैं।

माना जा रहा है कि गैर जाटव के साथ गैर यादव पिछड़ी जातियों ने भी बसपा के बजाय कांग्रेस की ओर रुख किया है। जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के ‘जिंदा’ होने से अब मायावती के सामने पार्टी के अस्तित्व को बचाने की बड़ी चुनौती है। सपा-कांग्रेस के मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने की बात पर चर्चा होने लगी है कि भाजपा और बसपा क्यों नहीं एक-दूसरे के हितों को देखते हुए विधानसभा चुनाव में हाथ मिला सकते हैं। आखिर पहले तो मिलकर सरकार बना ही चुके हैं।

अब क्या मायावती बीजेपी से हाथ मिलाएगी? या फिर वह भी अखिलेश की तरह इंडिया गठबंधन में शामिल हो जाएंगी??, सबसे बड़ी बात ये है की बीजेपी पर ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगा चुकी हैं, वहीं इंडिया गठबंधन में शामिल की बात को लेकर वह पहले ही न कर चुकी हैं, उन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले ही साफ कह दिया था की वह अकेले चुनाव लड़ेंगी, इंडिया गठबंधन में शामिल होने पर वह पहले से क्लीयर कर दिया की उनकी तरफ से न है, लेकिन हो सकता है की चुनाव में हार मिलने के बाद वह इस बारे में सोचें, वहीं बीजेपी की बात तो ये राजनीति है अपने हित के लिए पार्टी के नेता कुछ भी कर सकते हैं…


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