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हल्द्वानी- बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामले में 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई, केंद्र और धामी सरकार की कानूनी तैयारियां तेज

बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामले में 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई

चीफ जस्टिस की बेंच में तीसरे नंबर पर सूचीबद्ध है मामला, केंद्र और धामी सरकार की कानूनी तैयारियां तेज

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गृह विभाग ने जिला प्रशासन को दिए विशेष निर्देश

देहरादून/हल्द्वानी। हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे की जमीन पर कथित अतिक्रमण से जुड़े बहुचर्चित मामले में 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। मामला चीफ जस्टिस की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए सूची में तीसरे नंबर पर रखा गया है। ऐसे में इस दिन मामले में महत्वपूर्ण आदेश या फैसला आने की संभावना जताई जा रही है।

पिछले करीब दो महीनों से इस मामले की सुनवाई के लिए तारीखें निर्धारित होती रही हैं, लेकिन सूची में मामला नीचे होने के कारण सुनवाई नहीं हो पा रही थी। बताया जा रहा है कि रेलवे और उत्तराखंड सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया गया था। इसके बाद अब 9 सितंबर की तारीख महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अलर्ट

मामले में बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित होने की संभावना को देखते हुए गृह विभाग ने सुनवाई के दिन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जिला प्रशासन और पुलिस को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन की ओर से संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती समेत अन्य सुरक्षा इंतजाम किए जाने की तैयारी की जा रही है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी शासन स्तर पर इस मामले में प्रभावी कानूनी पैरवी के निर्देश पहले ही दे चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखने के लिए कानूनी तैयारियां की जा रही हैं।

क्या है पूरा मामला?

हल्द्वानी के बनभूलपुरा और गफूर बस्ती क्षेत्र में रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण का विवाद लंबे समय से अदालतों में चल रहा है। रेलवे और सरकार का पक्ष है कि विवादित जमीन रेलवे की है और वहां लंबे समय से अवैध कब्जे हैं। दूसरी ओर प्रभावित परिवारों की ओर से दावा किया गया है कि वे दशकों से वहां रह रहे हैं और उनके नाम स्थानीय निकायों के रिकॉर्ड में दर्ज हैं। कई परिवारों ने नगर निकायों को हाउस टैक्स आदि का भुगतान करने तथा बिजली-पानी जैसी सुविधाएं मिलने को भी अपने पक्ष का आधार बनाया है।

प्रभावित पक्षों की ओर से यह भी दलील दी गई कि लंबे समय से बसे परिवारों को अचानक हटाने से पहले उनके पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। क्षेत्र में मकानों के अलावा स्कूल और अन्य सामाजिक सुविधाएं भी लंबे समय से मौजूद होने का तर्क अदालत के समक्ष रखा गया।

जनवरी 2023 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

जनवरी 2023 में उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा अतिक्रमण हटाने के आदेश के बाद प्रभावित लोगों की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल प्रस्तावित ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

इसके बाद 24 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए प्रभावित लोगों के पुनर्वास की योजना तैयार करने पर जोर दिया था। अदालत ने संबंधित पक्षों को यह निर्धारित करने को कहा था कि रेलवे को वास्तविक रूप से कितनी भूमि की आवश्यकता है, कितने परिवार प्रभावित होंगे और उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था हो सकती है।

रेलवे ने पुनर्वास नीति नहीं होने की बात कही

मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से दाखिल हलफनामे में कथित तौर पर कहा गया कि अतिक्रमणकारियों के पुनर्वास अथवा मुआवजे के लिए रेलवे के पास कोई ऐसी नीति नहीं है जिसके तहत उन्हें पुनर्वास या क्षतिपूर्ति दी जा सके।

वहीं, राज्य सरकार और रेलवे का कहना है कि विवादित भूमि रेलवे की है और उस पर किया गया कब्जा वैधानिक अधिकार प्रदान नहीं करता। दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं की ओर से लंबे समय से निवास, स्थानीय रिकॉर्ड और विभिन्न नागरिक सुविधाओं को अपने पक्ष में आधार बनाया गया है।

2007 से अदालत में चल रहा है विवाद

याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी के अनुसार, बनभूलपुरा और गफूर बस्ती क्षेत्र में रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने का मामला नया नहीं है। वर्ष 2007 में भी हाईकोर्ट की ओर से कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे और उस दौरान करीब 2400 वर्गमीटर भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया गया था।

वर्ष 2013 में गौला नदी में अवैध खनन और गौला पुल से संबंधित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा दोबारा सामने आया। 9 नवंबर 2016 को हाईकोर्ट ने रेलवे को निर्धारित समय में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे।

इसके बाद प्रदेश सरकार और प्रभावित पक्षों की ओर से विवादित भूमि को नजूल भूमि बताए जाने का प्रयास किया गया, जिसे हाईकोर्ट ने जनवरी 2017 में स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और प्रभावित पक्षों को अपने दावे हाईकोर्ट के समक्ष रखने का अवसर दिया गया।

मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने रेलवे को अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली से संबंधित कानून के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए थे। कार्रवाई नहीं होने पर अवमानना याचिका भी दायर की गई।

अब 9 सितंबर पर टिकी निगाहें

21 मार्च 2022 को मामले से जुड़ी एक और जनहित याचिका हाईकोर्ट में दाखिल हुई। इसके बाद मई 2022 और दिसंबर 2022 में अदालत की ओर से प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने और अतिक्रमण हटाने से संबंधित निर्देश दिए गए।

बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और शीर्ष अदालत ने तत्काल बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए पुनर्वास समेत विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के निर्देश दिए।

अब 9 सितंबर को चीफ जस्टिस की बेंच के समक्ष मामला सूचीबद्ध होने के बाद हल्द्वानी ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का आदेश इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद की आगे की दिशा तय करने में अहम माना जा रहा है।