
व्हाट्सएप कॉल “कंफर्ट” के नाम पर, रंगदारी का मुकदमा पत्रकार पर!
खुद कॉल कर पैसे की पेशकश करने वाली SBI शाखा प्रबंधक बनी पीड़ित, पत्रकार बना आरोपी**
काशीपुर (उधम सिंह नगर)।
जनपद उधम सिंह नगर में एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली और निष्पक्ष जांच पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला भारतीय स्टेट बैंक (SBI) काशीपुर शाखा की शाखा प्रबंधक और एक स्थानीय पत्रकार से जुड़ा है, जहां वायरल ऑडियो के बावजूद पुलिस ने चौंकाने वाला कदम उठाते हुए पैसे की पेशकश करने वाली बैंक मैनेजर पर कोई कार्रवाई न कर, उल्टा पत्रकार के खिलाफ रंगदारी का मुकदमा दर्ज कर दिया।
पूरा मामला तब सामने आया जब एक व्हाट्सएप कॉल का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। ऑडियो में साफ तौर पर सुना जा सकता है कि कॉल खुद SBI काशीपुर की शाखा प्रबंधक द्वारा की गई, और बातचीत की शुरुआत यह कहते हुए होती है—
“मैं इसलिए कॉल कर रही हूँ कि आप कंफर्ट रहें…”
इसके बाद की बातचीत में पैसे की पेशकश, समझौते की कोशिश और हालात को मैनेज करने की बातें स्वयं शाखा प्रबंधक द्वारा की जाती सुनाई देती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे ऑडियो में पत्रकार की ओर से न तो पैसों की मांग की गई और न ही किसी प्रकार की धमकी या रंगदारी का संकेत मिलता है।
बिना जांच—सीधे मुकदमा!
स्थानीय लोगों और पत्रकारो का आरोप है कि पुलिस ने इस मामले में न तो ऑडियो की निष्पक्ष फॉरेंसिक जांच कराई, न ही यह जानने की कोशिश की कि कॉल किसने की और बातचीत किस दिशा में गई।
आरोप है कि “ना खाता, ना बही—जो बैंक मैनेजर ने कहा, वही सही” की तर्ज पर पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए पत्रकार को ही आरोपी बना दिया।
आरोपों से बचने की ‘पेशबंदी’ ?
सूत्रों की मानें तो बैंक मैनेजर पर पहले से ही कई गंभीर आरोप लगे थे। इन्हीं आरोपों से बचने के लिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत पत्रकार को फंसाने की पटकथा रची गई।
वायरल ऑडियो में यह भी स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि बातचीत सामान्य नहीं बल्कि पूर्व नियोजित (Pre-planned) थी, ताकि बाद में उसी को आधार बनाकर पत्रकार पर मुकदमा दर्ज कराया जा सके।
सहयोगियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में
इस पूरे खेल में शाखा प्रबंधक को कई प्रभावशाली लोगों का सहयोग मिलने की भी चर्चा है, जिनकी मदद से मामले की दिशा बदली गई और असली आरोपों से ध्यान हटाकर पत्रकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया।
पत्रकार संगठनों में आक्रोश
पत्रकार पर दर्ज मुकदमे के बाद जिले भर के पत्रकारों में भारी रोष है। उनका कहना है कि
अगर पैसे की पेशकश करने वाला ही सुरक्षित रहेगा और सवाल पूछने वाला पत्रकार आरोपी बना दिया जाएगा, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला है।
अब बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
क्या सच बोलने और सवाल पूछने की कीमत अब रंगदारी के मुकदमे से चुकानी पड़ेगी?
और क्या उधम सिंह नगर पुलिस बिना निष्पक्ष जांच के प्रभावशाली लोगों के इशारों पर काम कर रही है?
फिलहाल मामला तूल पकड़ता जा रहा है और आने वाले दिनों में यह विवाद पुलिस, बैंक प्रशासन और प्रेस की आज़ादी—तीनों के लिए बड़ी कसौटी साबित हो सकता है।
