Wednesday, May 31, 2023
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Uttarakhand: राज्य में महिलाओं को सरकारी नौकरी में,क्षैतिज आरक्षण को हाईकोर्ट से मिली चुनौती; सरकार से मांगा 6 हफ्तों में जवाब…..

उत्तराखंड: राज्य में सरकार द्वारा राज्य में विभिन्न सरकारी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के लिए अब नैनीताल हाईकोर्ट से चुनौती मिली है बता दें की हाईकोर्ट ने सरकार से 6 हफ्ते में जवाब मांगा है बता दें की हाल ही में हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की। हाई कोर्ट ने सरकार को छह सप्ताह के भीतर मामले में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं, आपकी जानकारी के लिए बता दें की अलबत्ता कोर्ट ने राज्य के आरक्षण अधिनियम पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई है लेकिन राज्य लोक सेवा आयोग की पीसीएस भर्ती प्रक्रिया के परिणाम को याचिका के निर्णय के अधीन कर दिया है। आपको बता दें की इसकी अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें राज्य में उपश्रेणियां जैसे महिलाएं, शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति, भूतपूर्व कर्मचारियों, स्वतंत्रता सेनानियों, खिलाड़ियों आदि को क्षैतिज आरक्षण मिलता है।

 

 

आज यानी मंगलवार को नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की खंडपीठ में दिल्ली निवासी आलिया की याचिका पर सुनवाई हुई। जिसमें कहा कहा गया है कि वह ऐसी महिला है, जिसके पास उत्तराखंड में निवास का डोमिसाइल नहीं है। बता दें की उत्तराखंड अपर पीसीएस परीक्षा-2021 में मेधावी होते हुए भी मात्र इसलिए अनुत्तीर्ण हो गई क्योंकि 24 जुलाई साल 2006 के सरकारी आदेश के माध्यम से उत्तराखंड महिला वर्ग को मूल निवास आधारित आरक्षण प्रदान किया गया था। इस आरक्षण से संबंधित शासनादेश को 24 अगस्त 2022 को उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी गई थी।

 

 

बता दें की डोमिसाइल आधारित आरक्षण पर रोक के कारण, याचिकाकर्ता का प्रारंभिक परीक्षा में चयन हुआ है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। जिसके बाद बीते 10 जनवरी, 2023 को राज्य विधानमंडल की ओर से इस अधिनियम को बनाया, और राज्य में डोमिसाइल आधारित आरक्षण को फिर से शुरू किया गया है। बता दें की उत्तराखंड राज्य में फिर से महिलाओं को सरकारी सेवाओं में क्षैतिज आरक्षण का कानून अस्तित्च में आने से छह फरवरी को याचिकाकर्ता को पीसीएस मुख्य परीक्षा के लिए अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया गया।आपको इसके साथ ही बता दें की याचिकाकर्ता के वकील डॉ कार्तिकेय हरि गुप्ता ने न्यायालय के समक्ष दलील दी है कि उत्तराखंड राज्य के पास डोमिसाइल आधारित महिला आरक्षण प्रदान करने को कानून बनाने की कोई विधायी क्षमता नहीं है। यह अधिनियम केवल उच्च न्यायालय के आदेश के प्रभाव को समाप्त करने के लिए लाया गया है, जो अवैधानिक है, भारत के संविधान में इसकी अनुमति नहीं है। बता दें यह अधिनियम भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है। आपको बता दें की इस याचिका में यह भी कहा गया गया है कि यह अधिनियम नहीं बनाया जा सकता क्योंकि यह एक संवैधानिक असंभवता है और विधानमंडल ऐसा करने में अक्षम है।

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